गाँव की शांत शामें हमेशा से ही राजू के लिए खास रही हैं। राजू एक साधारण किसान का बेटा था, जो अपने दोस्त सोनू के साथ खेलकूद करता। सोनू का परिवार भी गाँव में ही रहता था, और सोनू के पापा, हरिया चाचा, एक ताकतवर आदमी थे। हरिया की उम्र चालीस के आसपास थी, लेकिन उनका शरीर मजबूत और कद काठी लंबी थी। वे खेतों में काम करते हुए भी हमेशा फिट लगते। राजू की माँ, सुनीता, एक खूबसूरत औरत थीं। उनकी उम्र तीस के पार थी, लेकिन उनका शरीर अभी भी जवां था। गोल-गोल कूल्हे, भरी हुई छाती और लंबे काले बाल उन्हें गाँव की सबसे आकर्षक औरत बनाते। सुनीता अक्सर खेतों में काम करने जातीं, जहाँ वे फसल की देखभाल करतीं।
एक दिन, राजू स्कूल से लौटा तो देखा कि माँ खेत की ओर जा रही हैं। ‘माँ, कहाँ जा रही हो?’ राजू ने पूछा। सुनीता मुस्कुराईं, ‘बेटा, खेत में कुछ काम है। तू सोनू के पास चला जा।’ राजू ने हामी भरी और सोनू के घर चला गया। वहाँ सोनू के साथ खेलते हुए समय कट गया। शाम ढलने लगी, लेकिन राजू की माँ अभी तक नहीं लौटीं। राजू को चिंता हुई, लेकिन सोनू ने कहा, ‘अरे, हरिया चाचा भी खेत की ओर गए हैं। शायद माँ को मदद मिल जाएगी।’
खेत के बीचों-बीच, सुनीता फसल की जाँच कर रही थीं। धूप तेज थी, लेकिन अब शाम हो चुकी थी। अचानक उन्हें हरिया की आवाज सुनाई दी। ‘सुनीता भाभी, यहाँ क्या कर रही हो अकेले?’ हरिया ने पूछा। सुनीता ने मुड़कर देखा। हरिया का मजबूत शरीर पसीने से चमक रहा था। उनकी कमीज खुली हुई थी, छाती पर बाल झलक रहे थे। सुनीता का दिल धड़का। ‘हरिया जी, बस फसल देख रही हूँ। राजू का बापू तो शहर गया है, तो सब कुछ खुद ही संभालना पड़ता है।’
हरिया पास आ गए। ‘भाभी, अकेले मत घूमो। गाँव में तो ठीक है, लेकिन खेतों में खतरा हो सकता है।’ उनकी नजरें सुनीता के शरीर पर टिक गईं। सुनीता की साड़ी पसीने से भीगी हुई थी, जो उनके वक्ष को चिपकाए हुए थी। हरिया का लंड खड़े होने लगा। वे सोच रहे थे कि सुनीता कितनी हॉट है। ‘चलो, मैं मदद करता हूँ।’ हरिया ने कहा और फसल काटने लगे। काम करते-करते उनकी बाजू सुनीता की कमर से टकरा गई। सुनीता शर्मा गईं, लेकिन कुछ न बोलीं।
काम खत्म होने पर हरिया ने पानी का घड़ा निकाला। ‘भाभी, पियो।’ सुनीता ने घड़ा लिया और पीने लगीं। पानी बह गया उनकी गर्दन पर, साड़ी गीली हो गई। हरिया की आँखें चमक उठीं। ‘भाभी, तुम्हें देखकर तो लगता है जैसे कोई देवी हो।’ हरिया ने हँसते हुए कहा। सुनीता लजाईं, ‘हरिया जी, ऐसी बातें मत करो।’ लेकिन उनके मन में भी कुछ हलचल हो रही थी। पति शहर में महीनों से थे, और उनकी चाहतें दबी हुई थीं।
अचानक हरिया ने सुनीता का हाथ पकड़ लिया। ‘भाभी, मैं तुम्हें बहुत दिनों से चाहता हूँ। सोनू और राजू दोस्त हैं, लेकिन मैं तुम्हें अपना बना लूँ?’ सुनीता चौंकीं, लेकिन हरिया के मजबूत हाथों ने उन्हें खींच लिया। वे खेत के बीच में थे, चारों तरफ ऊँची फसलें। कोई देखने वाला न था। हरिया ने सुनीता को अपनी छाती से लगा लिया। उनके होंठ सुनीता के होंठों पर चिपक गए। सुनीता ने विरोध किया, लेकिन हरिया का चुंबन इतना गर्म था कि वे पिघल गईं।
हरिया के हाथ सुनीता की साड़ी पर सरकने लगे। उन्होंने साड़ी का आँचल खींच दिया। सुनीता की भरी हुई छाती बाहर आ गई। ब्लाउज में से उनके स्तन उभरे हुए थे। हरिया ने ब्लाउज के हुक खोल दिए। दो बड़े-बड़े स्तन बाहर कूद पड़े। हरिया ने एक स्तन मुंह में ले लिया और चूसने लगे। सुनीता की सिसकियाँ निकलने लगीं। ‘हरिया जी… मत… यह गलत है…’ लेकिन उनका शरीर साथ न दे रहा था। हरिया का दूसरा हाथ उनकी साड़ी के नीचे घुस गया। पेटीकोट के ऊपर से उनकी योनि को सहलाने लगा। सुनीता गीली हो चुकी थीं।
हरिया ने सुनीता को जमीन पर लिटा दिया। खेत की मिट्टी नरम थी। उन्होंने पेटीकोट ऊपर चढ़ा दिया। सुनीता की चूत नंगी हो गई। बालों से भरी हुई, गीली चूत। हरिया ने अपनी पैंट उतार दी। उनका मोटा लंड बाहर आ गया। कम से कम आठ इंच लंबा, मोटा और सख्त। सुनीता ने देखा तो डर गईं, लेकिन चाहत भी हुई। ‘हरिया जी, धीरे…’ वे बोलीं। हरिया हँसे, ‘भाभी, मैं तुम्हें स्वर्ग दिखाऊँगा।’
हरिया ने अपना लंड सुनीता की चूत पर रगड़ना शुरू किया। सुनीता की साँसें तेज हो गईं। फिर हरिया ने धक्का दिया। लंड आधा अंदर चला गया। सुनीता चीखीं, ‘आह… दर्द हो रहा है!’ हरिया रुके नहीं। पूरा लंड अंदर ठूंस दिया। सुनीता की चूत फटने लगी। वे दर्द से तड़पीं, लेकिन हरिया चोदने लगे। जोर-जोर से धक्के मारने लगे। ‘भाभी, तेरी चूत कितनी टाइट है! जैसे कुंवारी हो।’ हरिया गरजे। सुनीता अब दर्द भूल गईं। आनंद की लहरें दौड़ने लगीं। ‘हरिया… हाँ… और जोर से…’ वे बोलीं।
खेत में दोनों की आवाजें गूँज रही थीं। हरिया सुनीता के स्तनों को मसलते हुए चोद रहे थे। उनकी कमर तेजी से हिल रही थी। सुनीता ने पैर फैला दिए। हरिया का लंड उनकी चूत की गहराई तक पहुँच रहा था। पसीना दोनों के शरीर पर बह रहा था। मिट्टी पर लोटते हुए वे एक-दूसरे में खो गए। हरिया ने सुनीता को उल्टा कर दिया। अब कुत्ते की तरह चोदने लगे। सुनीता की गांड ऊपर उठी हुई थी। हरिया ने उनकी गांड पर थप्पड़ मारा। ‘भाभी, तेरी गांड भी मस्त है। कभी चुदेगी?’ सुनीता शर्मा गईं, लेकिन बोलीं, ‘जो तुम चाहो।’
हरिया ने लंड निकाल लिया और सुनीता की गांड पर रगड़ने लगे। थोड़ा सा तेल जैसा पसीना लगाकर धीरे से अंदर डाल दिया। सुनीता दर्द से चीखीं, लेकिन हरिया ने पूरा ठूंस दिया। गांड चोदने लगे। सुनीता की चीखें आनंद में बदल गईं। ‘हरिया… तेरी ताकत… आह…’ वे कराह रही थीं। हरिया की स्पीड बढ़ गई। लंड गांड में अंदर-बाहर हो रहा था। फिर वे वापस चूत में डाल दिया। अब दोनों छेदों का मजा ले रहे थे।
रात होने लगी थी। चाँद की रोशनी में खेत चमक रहा था। हरिया सुनीता को गोद में उठा लिया। खड़े होकर चोदने लगे। सुनीता के पैर हरिया की कमर पर लिपट गए। लंड ऊपर-नीचे हो रहा था। सुनीता के स्तन हरिया के मुंह में थे। वे चूस रहे थे। सुनीता का चरम आने वाला था। ‘हरिया… मैं… आ रही हूँ…’ वे चीखीं। उनकी चूत सिकुड़ गई। रस बहने लगा। हरिया भी जोर से धक्का मारा। उनका लंड फड़कने लगा। गर्म वीर्य सुनीता की चूत में छूट गया। दोनों हाँफते हुए गिर पड़े।
कुछ देर बाद सुनीता उठीं। कपड़े ठीक किए। ‘हरिया जी, यह क्या हो गया? अगर किसी को पता चला तो…’ हरिया मुस्कुराए, ‘भाभी, यह हमारा राज रहेगा। लेकिन फिर मिलेंगे।’ सुनीता शर्मा गईं, लेकिन मन में खुशी थी। वे घर लौटीं। राजू ने पूछा, ‘माँ, देर क्यों हो गई?’ सुनीता बोलीं, ‘बेटा, काम ज्यादा था।’
अगले दिन राजू सोनू के साथ खेल रहा था। सोनू के पापा हरिया राजू को देखकर मुस्कुराए। राजू को कुछ समझ न आया। लेकिन सुनीता हरिया को देखकर लजा जातीं। शाम को फिर खेत का बहाना बनाकर सुनीता गईं। हरिया पहले से वहाँ थे। इस बार वे और जोरदार थे। हरिया ने सुनीता को नंगा कर दिया। खेत में ही उन्हें चाटने लगे। जीभ से चूत चाटी, स्तनों को काटा। सुनीता मदहोश हो गईं। फिर चुदाई शुरू हो गई। इस बार हरिया ने सुनीता की चूत और गांड दोनों को भर दिया।
दिन बीतते गए। हरिया और सुनीता की मुलाकातें बढ़ गईं। खेत बन गया उनके प्रेम स्थल। कभी सुनीता हरिया का लंड मुंह में लेतीं। ब्लोजॉब देतीं। हरिया उनका रस पीते। कभी वे 69 पोजीशन में लिपट जाते। गाँव वाले कुछ शक न करते। राजू और सोनू बेखबर खेलते। लेकिन सुनीता की आँखों में चमक आ गई थी। हरिया की ताकत ने उन्हें नई जिंदगी दी।
एक दिन, बारिश हो रही थी। खेत कीचड़ भरा था। सुनीता भीगकर गईं। हरिया ने उन्हें गले लगा लिया। बारिश में नंगे होकर चुदाई की। कीचड़ पर लोटते हुए। हरिया का लंड सुनीता की चूत में फिसल रहा था। पानी और रस मिलकर बह रहे थे। सुनीता चीख रही थीं, ‘हरिया… चोद मुझे… तेरी रंडी बना दे…’ हरिया ने जोर-जोर से मारा। वीर्य बारिश के पानी में मिल गया।
इस तरह, माँ और दोस्त के पापा की कहानी खेतों में चलती रही। परिवार और दोस्ती के बंधन में छिपी यह चाहत कभी न रुकी। गाँव की शांत रातें अब गुप्त आनंद से भरी थीं। सुनीता हरिया की हो गईं, और हरिया सुनीता के गुलाम। खेत साक्षी बने इस निषिद्ध प्रेम के।
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